Tuesday, April 12, 2011

मैं दिल्ली के जिस मुहल्ले में रहता हूं पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार से आए प्रवासी मजदूर लोगों की संख्या अधिक हैं।इसी मुहल्ले में तथाकथित शिक्षित मध्यम वर्ग के लोग भी रहते हैं। एक दिन मेरे पड़ोसी के पांच वर्ष के बेटे ने अपनी मां से खांसी और जुकाम की शिकायत की। मां ने तपाक से डांटते हुए बेटे से कहा कि-मैने बार-बार आपसे मना किया है न कि बिहारियों के गंदे बच्चों के साथ मत खेलो। यह सुनकर मैं हैरान रह गया।

दिल्ली और मुम्बई जैसे महानगरांे में लाखों की संख्या में पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग रोजी-रोटी के तालश में आते है। लेकिन इन शहरों में उन्हें दोयम दर्जे का समझा जाता है,जैसे ये किसी विदेशी मुल्क के वासी हो। ये लोग मेहनत मजदूरी करके अपने बच्चों और परिवार के अन्य लोगों का भरण-पोषण करते है। यहां तक की प्राइवेट बस के कंड़क्टर भी किसी मासूम यात्री के हाव-भाव को देखकर अकड़ जाते है और कह देते है-अरे! वो बिहारी टिकट ले ले। ऐसे अनुभवों से इन्हें रोजाना दो -चार होना पड़ता हैं। शायद इन लोगों के पास ऐसी जिल्लत भरी जीवन जीने के सिवाय कोई विकल्प भी नहीं। मुम्बर्इ्र में आए दिन उत्तर भारतीयों पर शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ताओं द्वारा हमले किए जाते है। इस स्थिति में सरकार भी लाचार नजर आती है।राज्य सरकार भी रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में विफल साबित हुई है,वरना शायद ऐसी स्थिति न होती।

कहते है कि परिवार समाज पहली इकाई है। बच्चें स्कूल से पहले घर में ही सामाजिक के ककहरा सीखते है। वैसे ही समाज मेें व्यवहार भी करते है। बिहारियों के गंदे बच्चों के साथ खेलना और खांसी-जुकाम का संबंध मुझे तक अभी तक नहीं पता चला। मुम्बई और असम में उत्तर भारतीयों पर हमला कही इन संस्कारों का नतीजा तो नहीं ?

No comments:

Post a Comment